"मेरी लाश को पापा छू भी न पाएं..." युवा वकील प्रियांशु ने सुसाइड नोट लिखकर दी जान, रूह कंपा देगी वजह!
"मैं हार गया, पापा जीत गए": कानपुर कोर्ट की 5वीं मंजिल से कूदा वकील प्रियांशु, सुसाइड नोट में बयां किया 18 साल का टॉर्चर!
Managing Editor
Shubham TripathiPortal
ZYRO NEWS 24"पापा मुझे नामर्द, हिजड़ा और विकलांग कहते हैं। मोहल्ले के सामने बेइज्जत करते हैं। मैं थक चुका हूँ... भगवान किसी को ऐसे पापा न दें।" कानपुर कोर्ट परिसर में जब एक 24 साल के नौजवान वकील ने 5वीं मंजिल से छलांग लगाई, तो उसके पीछे एक ऐसा सुसाइड नोट मिला जिसने समाज की 'मर्यादा' के मुखौटे को उतार कर फेंक दिया।
कानपुर (ज़ायरो न्यूज़ 24): उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने बाप-बेटे के पवित्र रिश्ते पर कालिख पोत दी है। 24 वर्षीय प्रियांशु श्रीवास्तव, जो अपने पिता के साथ ही वकालत की प्रैक्टिस कर रहे थे, उन्होंने अपनी जान दे दी। लेकिन यह केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि सालों से चली आ रही मानसिक प्रताड़ना का चरम है। प्रियांशु का 4 पन्नों का सुसाइड नोट आज हर उस घर की कहानी बयां कर रहा है जहाँ बच्चों के सपनों और सम्मान को अपनों के ही पैरों तले कुचला जाता है।
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ज़ायरो न्यूज़ 24 की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, प्रियांशु ने अपने सुसाइड नोट में बचपन की एक ऐसी घटना का जिक्र किया है जिसे सुनकर रूह कांप जाती है। प्रियांशु ने लिखा कि जब वह महज़ 6 साल के थे, तब उन्होंने भूख लगने पर फ्रिज में रखा 'मैंगोशेक' पी लिया था। इस छोटी सी बात पर उनके पिता ने उन्हें नंगा करके घर से बाहर निकाल दिया था। वह अपमान, वह डर उस 6 साल के बच्चे के दिल में इस तरह घर कर गया कि वह आज 24 साल की उम्र में भी उसे भूल नहीं पाया।
प्रियांशु के नोट से साफ झलकता है कि उसके पिता उसे हर छोटी बात पर प्रताड़ित करते थे। वह एक मेधावी छात्र था, इंटरनेट वर्क करके घर का खर्चा चलाने में मदद करता था, लेकिन पिता की नज़र में वह हमेशा 'नालायक' और 'अपंग' ही रहा। प्रियांशु ने लिखा—"पापा मुझे नामर्द, हिजड़ा, अपंग, विकलांग और तरह-तरह के अपशब्द बोलते हैं।" क्या एक पिता अपने बच्चे के साथ ऐसा कर सकता है? यह सवाल आज कानपुर की सड़कों पर गूंज रहा है।
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सुसाइड नोट का सबसे दर्दनाक हिस्सा वह है जहाँ प्रियांशु ने अपनी मौत के बाद की इच्छा ज़ाहिर की है। उसने लिखा कि मरने के बाद उसके शरीर को उसका पिता हाथ तक न लगा सके। उसने अपनी माँ और बहन के प्रति तो प्यार जताया, लेकिन पिता के प्रति नफरत उसकी रग-रग में भर चुकी थी। उसने लिखा—"मैं हार गया पापा, आप जीत गए। अब आप खुशी से जिएं।"
कानपुर कोर्ट की पांचवीं मंजिल से कूदने से ठीक पहले भी प्रियांशु को सार्वजनिक रूप से डांटा गया था। प्रियांशु ने अपने करियर और मेहनत का भी जिक्र किया। वह दिनभर कचहरी में काम करता था, रात को ऑनलाइन काम करके पैसे कमाता था ताकि घर पर बोझ न बने। लेकिन पिता की धमकियाँ—"घर से निकाल दूंगा, ऑफिस से निकाल दूंगा"—ने उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ दिया।
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प्रियांशु श्रीवास्तव की मौत को केवल एक आत्महत्या कहना गलत होगा। यह एक मानसिक हत्या है। हमारे समाज में 'पिता' का स्थान भगवान के समान माना जाता है, लेकिन जब वही पिता भक्षक बन जाए, तो बच्चा कहाँ जाए? प्रियांशु ने अपने नोट में समाज से भी गुहार लगाई है कि वह उसकी माँ और बहन का ख्याल रखें।
कानपुर पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। सुसाइड नोट को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। वकीलों के समुदाय में भी इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है। क्या प्रियांशु के पिता पर कार्रवाई होगी? क्या समाज बच्चों की मानसिक सेहत को गंभीरता से लेगा? यह सवाल आज ज़ायरो न्यूज़ 24 प्रशासन से पूछ रहा है।
"अलविदा प्रियांशु! तुम्हारी ये हार समाज की सबसे बड़ी हार है।"
- शुभम त्रिपाठी, मैनेजिंग एडिटर


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